**प्राथमिक संपादकीय**
**जल संकट: भारत का 25% वैश्विक भूमिगत जल से क्यों संकेत करता है दुर्भाग्य**
भारत का जल प्रबंधन प्रथाओं में गिरावट का संकेत देने वाला वह 25% वैश्विक भूमिगत जल उपयोग का हिस्सा है। भूमिगत जल का संकट की दर की वजह से अर्धरेतीली और अर्धरेतीली क्षेत्रों में गंभीर पानी की कमी हो गई है, जिसे केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड (सीजीवीबी) ने 60% की गिरावट की रिपोर्ट दी है।
**त्वरित सारांश:**
* **वैश्विक भूमिगत जल उपयोग का 25%**: भारत की भूमिगत जल निकासी की चिंताजनक दर।
* **60% से ज्यादा कुएं सूखे हुए**: सीजी वीबी के डेटा से पता चलता है कि भूमिगत जल स्तरों में गिरावट।
* **70% ग्रामीण आबादी प्रभावित**: भूमिगत जल संकट से भारत के ग्रामीण समुदाय प्रभावित हुए हैं।
**क्या हुआ**
केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड (सीजी वीबी) ने 1973 से भारत में भूमिगत जल स्तरों की निगरानी शुरू की है। सीजी वीबी के नवीनतम डेटा के अनुसार, देश के अर्धरेतीली और अर्धरेतीली क्षेत्रों में भूमिगत जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। सीजी वीबी के अनुसार, भूमिगत जल स्तरों में 60% की गिरावट हुई है, जिससे 60% भारत के कुएं प्रभावित हुए हैं। यह दर जैव विविधता, जल निकासी और लैंड सब्सिडेंस के कारण चिंताजनक है।
भूमिगत जल की निकासी का मुख्य कारण खेती के लिए, उद्योगों के लिए और घरेलू उपयोग के लिए भूमिगत जल का अत्यधिक निकासी है। खेती का हिस्सा भारत के भूमिगत जल उपयोग का 80% से अधिक है, कई किसानों ने व्यावसायिक बीजक के लिए भूमिगत जल के उपयोग पर निर्भर हैं। हालांकि, यह अस्थिरता ने भूमिगत जल संसाधनों के महत्वपूर्ण स्तर को कम कर दिया है, जिससे देश के खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास को खतरा हो गया है।
**यह क्यों महत्वपूर्ण है**
भारत का भूमिगत जल संकट देश की खाद्य सुरक्षा, आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थायित्व के लिए गंभीर परिणामों का कारण बनता है। 70% ग्रामीण आबादी पीने के लिए, खाना बनाने के लिए और सिंचाई के लिए भूमिगत जल पर निर्भर करती है, जिससे लाखों लोगों के जीवन को खतरा हो गया है। इसके अलावा, भूमिगत जल स्तरों में गिरावट ने जमीन की गिरावट, पानी की जमाव, और सलाइनीकरण को बढ़ावा दिया है, जिससे कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हुई है।
**आर्थिक परिणाम**
इस संकट के आर्थिक परिणाम भी महत्वपूर्ण हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, भारत का भूमिगत जल संकट 2025 तक देश के 2% जीडीपी के नुकसान का कारण बन सकता है। इसके अलावा, संकट के गंभीर पर्यावरणीय परिणाम हैं जैसे कि मिट्टी की गुणवत्ता का विनाश, जैव विविधता की हानि, और हरित गैस उत्सर्जन में वृद्धि।
**कुंजी प्रतिक्रियाएं / उद्धरण**
“हम भारत में भूमिगत जल संकट का सामना कर रहे हैं, भूमिगत जल स्तरों में गिरावट की दर बहुत चिंताजनक है। हमें जल प्रबंधन प्रथाओं में सुधार के लिए स्थायी जल प्रबंधन प्रथाओं को अपनाना चाहिए।” – श्री गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री।
“भारत में भूमिगत जल संकट एक जागरण का संकेत है। हमें जल संरक्षण, कुशल सिंचाई प्रणाली, और स्थायी खेती प्रथाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। हमें पर्यावरणीय स्थायित्व और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए काम करना चाहिए।” – डॉ. विमल मिश्रा, केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड के निदेशक।

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